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कॉरोना काल – महामारी में आलोचनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की जरूरत

आप सभी को विदित है कि पूरे विश्व सहित भारत देश के अंतर्गत अन्य राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। अगर आंकड़ों को देखें तो छत्तीसगढ़ में अब तक कुल 5832470 टेस्ट हुए हैं जिनमें 486244 लोग पॉजीटिव पाए गये हैं। यह राज्य के कुल जनसंख्या का 1.6 प्रतिशित है। इनमें से अब तक 5307 मृत्यु हुई है जो कि कुल जनसंख्या का 0.01 प्रतिशत एवं पॉजीटिव प्रकरणों का 1.1 प्रतिशत है। अब तक यह दर अन्य बीमारीयों (सार्स 11 प्रतिशत, मर्स 33 प्रतिशत, डेंगू 26 प्रतिशत, टीबी 5 प्रतिशत आदि) के तुलना में कम है।
परंतु सवाल यह उठता है कि आखिर मृत्यु हो क्यों रही है? अगर हम कोरोना के प्रारंभिक संक्रमण के चरण एवं स्त्रोतों में जाएं तो मात्र हाथ धोने एवं मास्क लगाने से ही 90 प्रतिशत बचाव संभव है। परंतु अप्रैल 2021 की एक स्टडी अनुसार 50%लोग #मास्क नहीं पहनते। 50% लोग जो मास्क पहनते हैं-उनमें से:

  • 64% नाक नहीं ढँकते
    -20% ठुड्डी पर पहनते हैं
    -2% गले पर पहनते हैं
  • केवल 14% लोग ही मास्क ठीक से पहनते हैं
    इसके बाद महत्वपूर्ण है कि भीड़-भाड़ वाले स्थानों में लोग शारीरिक दूरी बनाकर रहें। लेकिन बाजार, दुकानों, सार्वजनिक कार्यक्रमों में ऐसा व्यवहार अपनाते लोगों को नहीं देखा जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप संक्रमण का बढ़ना लगातार जारी रहा। इसमें बहुत महत्वपूर्ण है कि दूसरा दौर पहले दौर से अधिक तीव्रता लिये हुए एवं नये लक्षणों जैसे -सिर दर्द, दस्त, उल्टी होना, मूंह सूखना, बदन दर्द के साथ था।
    अगला महत्वपूर्ण कदम लक्षणों के आने पर जांच कराने का होता है। इस कदम में भी आम जनता पीछे होती रही क्योंकि जांच के पॉजीटिव आने पर एक मेहनतकश वर्ग को अपने काम छूट जाने का भय था तो दूसरे उच्च वर्ग को अपने कार्यक्रम छूट जाने का भय था। राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों की अपनी प्राथमिकताएं थी। जांच में कमी आने पर दूसरे दौर के पूर्व कई जांच केंद्र बंद कर दिये गये परंतु जांच हेतु सैंपल का लिया जाना जारी रखा गया। दूसरे दौर के आने के बाद अचानक से जांच के लिए लैब की आवश्यकताएं पूर्व की तुलना में कई गुना बढ़ गई परंतु उतनी तेजी से वापस लैब का खोला जाना संभव नहीं हुआ। अतः जांच के परिणामों के आने में देरी होती गई। इस बीच नियमानुसार व्यक्ति को स्वयं से अगल हो जाना होता है। परंतु इसका पालन भी नहीं हुआ। दूसरी ओर जां के परिणाम देने की प्रक्रिया में भी तेजी सुधार नहीं किया जा सका। इस बीच यह असमंजस की स्थिति बनी रही कि मरीज को दवाई लेनी चाहिए या नहीं! कई लोग इस दौरान अपने घरेलू इलाज करने लगे या सही इलाज नहीं ले सके जिसके कारण उनकी स्थिति सुधरने के बजाए बिगड़ने लगी।
    इसी तरह कई ऐसे मरीज जो पूर्व में किसी अन्य बीमारी जैसे सुगर, हाई बीपी से ग्रसित थे या जिनके शरीर में दैनिक जीवन में सही दिनचर्या न होने के कारण प्रतिरोध क्षमता में कमी थी, उनमें लक्षण तेजी से दिखाई देने लगे। जिस गति से लक्षण दिखाई दे रहे थे उस गति से मरीज को जानकारी देने के लिए सार्वजनिक या स्थानीय स्तर पर डॉक्टरों की संख्या नहीं थी। इस कारण गंभीर मरीज की संख्या बढ़ती गई। ऐसे गंभीर मरीजों में चार प्रकार के मरीज विशेष रूप से मृत्यु तक तेजी से पहंुचने वाले जिनमें ऑक्सीजन की अचानक कमी होना, ऑक्सीजन का उपलब्ध न होना, भयभीत हो जाना, वेंटीलेटर का न मिलना शरीर में प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने के लिए दिये गये दवाओं का असर न होना। इस दौरान ऑक्सीजन की कमी होने पर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध ऑक्सीजन कंसटेªटर भी उपयोगी हो सकता था। परंतु भय स्वरूप या जानकारी में कमी के कारण लोग अस्पतालों की ओर दौड़ने लगे।
    जो मरीज होम आइसोलेशन को समय पर अपनाएं एवं उनके नियमों का पालन करते रहें। उनमें भी गंभीर स्थिति आने पर मृत्यु हुई जिसके प्रमुख कारक समय पर डॉक्टरों से बातचीत न हो पाना, अस्पताल जाने के लिए एम्बुलेंस का न पहुंचना, अस्पतालों में बैड नहीं मिल पाना।
    मृत्यु के आंकड़ों ऐसे महामारी के दौरान किसी भी विभाग, सरकारों या विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी चुनौति होती है क्योंकि संक्रमण की गति से लेकर प्रभावित करने की संख्या में वायरस अपना प्रकार एवं तरीका बदलता रहता है। उसके जीवन चक्र में लगतार शोध एवं अध्ययन करके समझा जा सकता है जो कि वर्तमान परिस्थितियों में प्रगति पर है।
    एक वेबसाइट के अनुसार राज्य के रायपुर जिले में ही कुल 62 निजी अस्पताल हैं इसे मिलाकर कुल 508 आसीयू बैड एवं 29111 कोविड बैठ है। यह आंकड़े पूराने हो सकते हैं लेकिन मृत्यु की संख्या से अधिक दूर नहीं है। परंतु अंतिम समय में पहुंचने वाले मरीजों के कारण उपलब्ध संसाधनों पर दबाव इतना अधिक बढ़ रहा है कि लोगों को यह संदेश जाता है कि उपलब्धता नहीं है। इसके अतिरिक्त ऐसे समय में बहुत से उत्पादों का नया बाजार खड़ा होता है जो आपदा को अवसर में बदल देता है। सामाजिक वातावरण में ऐसे बाजार खड़ा करने वाले गिरोह अति सक्रिय होकर किसी विशेष उत्पाद की मांग को बढ़ाकर पूर्ति को कम दिखाकर महंगे दामों में बचने में सक्षम होती जाती है। परंतु जब आप आंकड़ों को बहुत करीब से देखेंगे या जानकारियों को सही तरीके से समझ पायेंगे तो आपको इस आपदा लड़ना एवं लोगों तक समाधान को पहुंचाना सरल होगा।
    ऐसे समय में महत्वपूर्ण है महामारी के प्रभाव को कम करना या रोकने पर विभिन्न तरीकों के प्रयासों की आवश्यकता होती है। कोविड 19 के दौरान सबसे महत्वपूर्ण सहयोग की आवश्यकता मानव संसाधन की दिखाई दे रही है। इस पूरे महामारी में सहयोग के लिए आगे आने वाले सेवकों को भी बचाये जाने के प्रयास पर कोई भी दावा नहीं कर सकता। ऐसे में कुछ प्रयोग छत्तीसगढ़ रायपुर जिले में समर्थ चैरिटेबल ट्रस्ट, वी द पीपल, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजीकल, टेसू मीडिया लैब एवं यूनिसेफ द्वारा प्रशासन के साथ दिये जाने का प्रयास किया जा रहा है। इस महामारी से लड़ने के लिए वर्तमान में व्यवहार परिवर्तन के अतिरिक्त वैक्सीन ही एक मात्र उपाय है। इसलिए 300 स्वैच्छिक सेवकों की एक कोरोना योद्धाओं की सेना तैयार की जा रही है जो ’’रोको अउ टोको’’ अभियान के तहत ऐसे वार्ड में जाकर लोगों को जागरूक कर रहे हैं जहां वैक्सीन को लेकर भ्रांतियां अधिक है एवं लोग वैक्सीन लगवाने में भाग कम ले रहे हैं।
    इसके अतिरिक्ति होम आइसोलेशन के छुटे हुए मरीजों से संपर्क स्थापित कर उन्हें फार्म भरने में सहयोग करने एवं वर्तमान में होम आइसोलेशन में शामिल मरीजों से बातचीत कर उनके समस्याओं को समझने एवं सही विभाग या नोडल अधिकारी तक पहंुचाने का कार्य कॉल सेंटर के माध्यम से किया जा रहा है। यह कॉल सेंटर की सुविधा जिला प्रशासन द्वारा मुहैया कराई गई है एवं इनमें कॉलर व तकनीकी सहयोगियों की उपलब्धता अजीम प्रेमजी फाउंडेशन व फ्रैंक वाटर द्वारा वित्तीय सहयोग कर समर्थ चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से किया जा रहा है।
    एक बड़ी चुनौति होम आइसोलेशन का फार्म भरने वाले मरीजों तक सही समय पर दवाईओं की उपलब्धता करवाना है। इसके लिए रायपुर के 10 जोन में लगभग 70 वालिंटियर्स कार्यरत हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय को सहयोग देने हेतु 3 स्वयं सहायता समूह की 26 महिलाएं दवाईयों की पैकिंग में लगी हुई हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि दो समूह दिव्यांग महिलाओं का है।
    इसके अतिरिक्त होम आइसोलेशन एवं कंट्रोल रूम के कॉल अटेंड करने व उन्हें समाधानित होते तक नोडल के साथ समन्वय स्थापित किया जा रहा है। इसी तरह भोजन वितरण से लेकर इंडोर स्टेडियम में विभिन्न स्तर के समन्वय हेतु स्वैच्छिक कार्यकर्ता लगातार प्रशासन के सहयोग में लगे हुए हैं। उक्त सभी प्रक्रियाओं में लगभग 20 समन्वयक हर स्तर पर आवश्यकताओं का आंकलन कर 18 से 30 आयु के वालिंटियर्स तैयार करने एवं उनके माध्यम से प्रशासन को मानव संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का कार्य कर रहे हैं।
    उक्त औपचारिक प्रयासों के अतिरिक्त 50 लोगों का एक ऐसा वाट्सएप्प गु्रप बनाया गया है जिसमें विभिन्न स्त्रोंतों से प्राप्त समस्याओं को गुगल फार्म में डाला जाता है एवं उन्हें समाधान हेतु संबंधित अधिकारी को दिया जाता है। इस समूह में प्रतिदिन 20 से 30 गंभीर समस्याएं आती है जिनमें प्रमुख ऑक्सीजन की उपलब्धता, बैड की आवश्यकता, एम्बुलेंस जानकारी एवं निजी अस्पतालों से संपर्क हैं। समूह के सदस्यों में सबसे वरिष्ठ डॉ. राकेश गुप्ता हैं जिनके माध्यम से तकनीकी पहलुओं पर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। यह समूह 24 घंटे एक अनौपचारिक कंट्रोल रूम के रूप में कार्य कर रहा है। इसके लिए समूह के सदस्य हर जानकारी से अद्यतन रहने का प्रयास करते रहते हैं जिससे आमजन के बीच की भ्रंातियों को दूर किया जा सके एवं अधिक से अधिक लोगों तक सही जानकारी पहुंचाया जा सके। समूह के सदस्यों द्वारा विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रयासों को भी लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
    ऐसे आपदाएं न केवल सरकारों, प्रशासन, सामाजिक संगठनों वरन व्यक्तिगत रूप से सभी के लिए एक सीख होती है परंतु चिंता का विषय अब भी यह है कि हम मृत्यु से भयभीत होकर भाग तो रहे हैं परंतु सचेत होकर अपने दैनिक जीवन को बेहतर करने के प्रयास में सोच नहीं पा रहे हैं जिससे कि हमारी प्रतिरोध क्षमता भी बढ़े और हम मात्र प्रतिरोधियों से कम होने वाली बीमारीयों से मृत्यु तक न पहुंचे। स्वयं के खान-पान, शारीरिक मेहनत एवं शुद्ध हवा का हमने अपने जीवन से दूर कर दिया है। इस पर भी काम करने की आवश्यकता हैं। इसके अतिरिक्त समाज सेवा के लिए खड़े सामाजिक संगठनों को भी मानसिक रूप से लोगों को ऊर्जावान रखने से लेकर सही जानकारी पहुंचाने तक के प्रयास लगतार किये जाने की आवश्यकता है। परंतु इस आपदा में संगठनों की कमी भी दिखाई दे रही है या इनकी भूमिका मात्र भोजन पहुंचाने तक सीमित हो गई है।
    प्रशासन एवं सरकारों के लिए अपने स्वास्थ्य नीति पर गंभीरता से विचार एवं चिंतन करने का समय है। ऐसे ही आपदाएं लंबी अवधि के कार्ययोजनाओं को सोचने-समझने का दबाव बनाती है और एक मजबूत व्यवस्था के रूप में सामने ला सकती है। छत्तीसगढ़ राज्य में सभी हेल्प लाइन नंबर उठाये जा रहे हैं। इससे ही सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा सकता है जबकि पड़ोसी राज्यों में हाल ही के समाचारों ने बताया की लोगों को जानकारी भी नहीं है। प्रशासन के करीब काम करते हुए यह भी समझ में आता है कि मानव संसाधनों की सीमित उपलब्धता एवं लगातार कोविड के प्रभाव में घर लौटते सदस्यों के साथ प्रेरित रहकर लड़ना उनके लिए कितना चुनौतिपूर्ण है। ऐसे में वैकल्पिक समाधान देकर सहयोग किया जाना ही एकमात्र विकल्प दिखाई देता है जिस पर हम सब लगातार साथ खड़े हैं। राहत इस बात की है कि हमारे द्वारा आंकलन किये जा रहे सभी कमियों के वैकल्पिक समाधानों पर प्रतिदिन सुनवाई भी हो रही है और क्रियान्वयन भी हो रहा है। इसे देखते हुए सभी से यह उम्मीद किया जाना उचित है कि आप भी सहयोग में आगे बढ़िये आपको प्रयासों का सकारात्मक पक्ष दिखेगा एवं मृत्यु के नकारात्मक पक्ष को कम करने में आप स्वयं को सक्षम पायेंगे। इसी के साथ छत्तीसगढ़ मॉडल भी देश इस महामारी से लड़ने में एक उदाहरण बन सकेगा।
    (आंकड़ों के स्त्रोत विभिन्न वेबसाइट एवं शोध पत्रों से लिया गया है)
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