मंटो की लेखन शैली, उर्दू का नायाब उपहार मंटो

 

बेहद तेज गति से लिखते थे मंटो !!

मंटो के रूप में भारतीय उपमहाद्वीप ने एक विश्व स्तर का कहानीकार पैदा किया है. मैक्सिम गोर्की से प्रभावित मंटो ने जब लिखना शुरू किया था, तब तक प्रेमचंद के चलते उर्दू साहित्य रुमानियत को पीछे छोड़ कर यथार्थ के ठोस धरातल पर आ चूका था. उनके समकालीन कहानीकारों- राजिंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, कृष्ण चन्दर भी उर्दू साहित्य को बेहद समृद्ध कर रहे थे, पर मंटो अपने लिए बिलकुल अलग मुकाम बना पाए.

हालाँकि मंटो के बचपन में ऐसी कोई झलक नहीं मिलती, जिससे उनकी आने वाली महानता का एहसास हो सके. बचपन में पढ़ने लिखने में ध्यान नहीं देते. समय खेलने कूदने और शरारतों में जाता. दो बार उर्दू विषय में फेल हो गए, तीसरी बार किसी तरह पास हुए. हिन्दू महासभा कॉलेज में एडमिशन लेकर वे अपनी टेक्स्ट बुक से बाहर फ़िल्मी मैगजीन्स पढ़ा करते. उनके जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव आया जब वे पत्रकार अब्दुल बारी अलिग से मिले. मंटो ने आगे चलकर उन्हें अपना मेंटर बताया. अब्दुल बारी किताबों के शौक़ीन थे. उन्होंने मंटो के अंदर छिपी प्रतिभा को पहचाना, और उन्हें विश्व साहित्य से जोड़ा। अब्दुल बारी के साहचर्य में मंटो ने काफी तेजी से ऑस्कर वाइल्ड, विक्टर ह्यूगो, मोपासां, चेखोव आदि कथाकारों को गहराई से पढ़ा. अब्दुल बारी ने उन्हें इन महान कथाकारों की कुछ रचनाओं के अनुवाद के कार्य से भी जोड़ा.
अलीगढ यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए गए मंटो पर उनकी पढ़ाई टीबी के चलते बाधित हुई. वहां से वापस आकर लाहौर में एक अखबार में काम किया. लेकिन अख़बार में उपलब्ध सीमित स्वतंत्रता के चलते वे आजिज आकर बॉम्बे चले गए. बॉम्बे में एक फिल्म मैगज़ीन मुसव्विर के एडिटर के रूप में १९४० तक काम किया. इस दौरान वे फिल्मों से भी जुड़े. डायलाग, स्क्रिप्ट आदि लिखने लगे. लेकिन फिल्मों में लिखने पर भी उन्हें रचनात्मक सुकून नहीं मिला.
मुसव्विर में नौकरी खो देने के बाद वे दिल्ली आ गए और आल इंडिया रेडियो से जुड़ गए. यहाँ कई साहित्यकारों का जमावड़ा था. उनके साथ इंटरेक्शन से और साथ ही रेडियो के लिए नाटक, फीचर आदि लिखने के चलते उनकी लेखनी में धार आने लगी. मंटो काफी तेजी से लिखते, और उन्हें अपनी लेखनी पर इतना यकीं और गुरुर था कि वे अपने स्क्रिप्ट को दूसरी बार देखते भी नहीं थे. आल इंडिया रेडियो में काम करते हुए उनका अपने बॉस उपेन्द्रनाथ अश्क़ से झगड़ा हो गया जिन्हे वे बहुत अव्वल दर्जे का लेखक नहीं मानते थे. कोम्प्रोमाईज़ नहीं करने के स्वाभाव के चलते उनका अपने सहयोगियों के साथ रह रह उनकी तनातनी हो जाया करती.
आल इंडिया रेडियो की नौकरी छूटने के बाद वे फिर से बॉम्बे आ गए. मुसव्विर से एक बार फिर से जुड़े और फिल्म राइटिंग से भी और गहरे जुड़े. इस बीच उन्हें एक ऐसा सदमा लगा जिससे वे जीवन भर उबर नहीं सके- अपने बेटे का देहांत. अपने बेटे से बेहद प्यार करते थे मन्टो. मंटो का व्यक्तिगत जीवन दर्द से भर गया.

बॉम्बे में रहते हुए देश के विभाजन ने उन्हें सदमा दिया.देश में सांप्रदायिक विद्वेष बढ़ रहा था, बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में भी ये मवाद फ़ैल रहा था. इसी बीच उनकी कहानियों पर लाहौर हाई कोर्ट में अश्लीलता का मुकदमा चल रहा था. वे इस्मत चुग़ताई के साथ लाहौर गए. इस्मत पर भी लिहाफ कहानी के लिए अश्लीलता रहा था. मंटो को सजा हुई और उन्हें जुर्माना भरना पड़ा. इस्मत पर केस खारिज हुआ.

मंटो फिर पाकिस्तान चले आये. दंगों की भीषिका और इंसानियत के क़त्ल के गवाह थे मंटो. इस दौरान उन्होंने अपनी सबसे पावरफुल कहानियां लिखीं.
टोबा टेक सिंह, ठंडा गोश्त, खोल दो, टिटवाल का कुत्ता आदि कहानियां विश्व साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में शुमार होती हैं. 1955 में 43 साल की उम्र में मंटो का देहांत हो गया.

पाकिस्तान में रहते हुए अपनी कहानियों पर मुकदमों से परेशां मंटो ने पेन स्केच लिखा था जो दो vols में प्रकाशित हुआ था- गंजे फ़रिश्ते और लाउडस्पीकर. उनका ख्याल था इस तरह से वे समाज के नैतिकता के ठेकेदारों से बचे रहेंगे.

हिंदुस्तान में रहते हुए मंटो ने इस्मत चुगताई का पेन स्केच लिखा था- इस्मत चुग़ताई. मंटो जब पाकिस्तान चले गए, तो इस्मत चुग़ताई काफी आहत हुईं. उन्होंने बहुत बाद में मंटो पर पेन स्केच लिखा- मेरा दोस्त, मेरा दुश्मन (1960).

 

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