बंगाल में हिंसा के मायने

अइसे तो खेला होबे न
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पश्चिम बंगाल में भाजपा की हार के बाद उभर रही दंगाई और हिंसक तस्वीर पर इस आधार पर चुप्पी नहीं साधी जा सकती कि उसके पहले गुजरात नरसंहार को आप म्लेक्ष-शुद्धि यज्ञ मान कर भितरे भीतर गदगद थे और फिर दिल्ली में गोली मारो सालों के मंत्रोद्घोष से पुलकित थे और प्रेम के पहरुए बने एंटी रोमियो अभियान चला रहे थे और गऊ मइया की शील-रक्षा के लिए सड़क पर तांडव मचा रहे थे और सनातनी बलात्कारी संस्कृति के पुरोधा सांसदों को अदालती संरक्षण देने के लिए आधी रात में दलितों का जबरिया अंतिम संस्कार कर रहे थे ।
न ।
कतई नहीं ।

पुराने अपराधों को गिना कर आप बंगाल में हिंसा पर होंठ नहीं सिल सकते, समर्थन करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता ।

पर आप युवा फायर ब्रांड नयी योगी-स्थापना और चेतावनी को भी नज़रअंदाज नहीं कर सकते तो जो अप्रैल में ही 2 मई के चुनाव परिणाम के बाद के लिए दी गयी थी । वह चेतावनी थी कि धमकी ? कि जीतेंगे तो और हारेंगे तो, विरोघियों को जलाकर ख़ाक कर देंगे । यह वक्तव्य किसके बूते, क्या सोच कर, किस समीकरण के तहत दिया गया था और अब जब भाजपा बंगाल में पिट चुकी है तो उसका बंगाल की उभरती वर्तमान हिंसात्मक गतिविधियों से क्या ताल्लुक है ?

ममता को समझना होगा कि वे अपने ख़िलाफ़ साजिशी हिंसा की दलील देकर बच नहीं पाएंगी ।

ममता को समझना होगा कि काडर और कार्यकर्ता में फ़र्क होता है ।

भाजपा की जड़ें जब तक काडर के हाथ में रहीं, वह पनपती रही । जब कंट्रोल काडर के हाथ से निकल कर कार्यकर्ताओं के हाथ चला गया , कमल कींचड़ में लिथड़ने लगा ।
नाम लेकर समझाना हो तो तीन प्रतीक चुन सकते हैं । गोरखपुर के विधायक राधामोहन दास, गोरखपुर के ही सांसद और अब प्रदेश के मुखिया योगी जी और नयी नयी प्याज खाके मुल्ला बनी हिरोइन भाजपाई कंगना रनौत के बयानों और गतिविधियों से आप काडर और कार्यकर्ता के अंतर को समझ सकते हैं ।

बंगाल में वामपंथियों का काडर भी कालांतर में फ़क़त कार्यकर्ता हो गया था । फिर हुआ वही जो नहीं होना था । केरल से बेहतर उदाहरण कोई नहीं हो सकता जहां काडर ही कार्यकर्ता है और कार्यकर्ता ही काडर । किसान आंदोलन की सारी सफलता और तथाकथित असफलता के पीछे भी यही सूत्र है ।

कार्यकर्ता किसी भी आंदोलन या राजनीतिक पहल को कैश क्राप समझता है और उसी रूप में सफलता का हिस्सेदार बन उसमें फ़ौरन नफ़ा नुकसान और व्यक्तिगत दोस्ती दुश्मनी निभाता है । जेनऊ छात्रसंघ की अध्यक्ष भी अपनी कुर्सी नहीं निकाल पाईं जबकी देशभर में वो संघर्ष का प्रतीक बन गयी थीं । और कन्हैया बाबू के क्या समाचार हैं ?

अबतो ख़ैर किस पार्टी में कितने कार्यकर्ता रह गए हैं और कितना काडर बचा है इसे कांग्रेस के बेहतर कौन जान सकता है ।
राहुल गांधी न तो पक्ष-द्रोही बाबा बन कर प्रतिद्वंदी विपक्षी पार्टियों को चुनावी सदाव्रत बांट पा रहे हैं न ही दमदार विपक्ष बन पा रहे हैं । न काडर है न कार्यकर्ता ।
हैं तो केवल प्रियंका ।

तो ममता जी घड़ी की सुई अपने हाथ में रखिए । कहीं ऐसा न हो कि समर्थक और समर्थन के नाम पर लाल या नारंगी घुसपैठिए घड़ी की सुई पीछे घुमाने में सफल हो जाएं । आपने नाटक का जवाब नाटक से दिया और देश ने दाढ़ी और प्लास्टर के चुनावी मंचन में अपनी पसंद का इज़हार भी कर दिया है ।
मगर अब ?

इस देश ने हिंसा कभी बर्दाश्त नहीं की है और न कभी बर्दाश्त करेगा । इसे नक्सलवादी भी जान चुके हैं और मजहबी आतंकी भी । सबको जीने बोलने खाने पहनने का अधिकार है और उसमें जो भी रुकावट बनेगा, मिट जाएगा ।

फ़िलहाल इतना ही । आमार सोनार शांत बांगला !
सुप्रभात !

● देवेन्द्र आर्य

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