कलम के सिपाही की जादूगरी

 

प्रेमचंद के पुत्र और साहित्यकार अमृत राय ने 1962 में हिंदी के महानतम साहित्यकार प्रेमचंद की जीवनी ” कलम के सिपाही” शीर्षक से लिखी. उन्होंने अपने पिता का dispassionate एनालिसिस किया है. हिंदी में किसी लेखक की ये पहली जीवनी अब क्लासिक का दर्जा पा चुकी है. अमृत राय को इस बायोग्राफी के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इसका अंग्रेजी अनुवाद हरीश त्रिवेदी ने किया है. जो मेरे पास है
अपने पिता के एक पैशन को याद करते हुए अमृत राय लिखते हैं,
वे आराम से उपन्यास, कहानी और लेख लिखते रह सकते थे, जिससे वे आसानी से हर महीने 40-50 रूपये कमा सकते थे, पर नहीं एक चीज होती है पैशन. ( प्रेमचंद का पैशन था अपना प्रेस खोलना; अमृत राय को ये आईडिया कभी जंचा नहीं). ये एक पुराना पैशन था, जो उनके दिमाग में पिछले कई वर्षों से पनप रहा था.
उनके बारे में कह भी नहीं सकते कि वे आँखें बंद करके कूद जाते थे, दिक्कत ये थी कि वे आँखें खोल कर कूदते ( रिस्क टेकिंग) थे !! ओह्ह कैसी मृगमरीचिका थी ये जिसका पीछा वे जीवन भर करते रहे !!
फिर थोड़ा खुद को ही समझाते हुए अमृत राय लिखते हैं, हम सब किसी न किसी illusion के पीछे भागते हैं… प्रेमचंद न सत्ता न झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहे थे.

प्रेमचंद की जीवनी हिंदी साहित्य के कितने विद्यार्थियों ने या हिंदी के महानतम कथाकार के कितने प्रशंसकों ने पढ़ी है, नहीं जानता, पर ये तय है कि भारतीय साहित्य का अध्ययन और इसकी समझ प्रेमचंद के अध्ययन के बिना अधूरी रहेगी.
इस किताब को हिंदी ( मूल रचना 640 पेज में है) में पढ़ा जाए तो और बेहतर. क्यूंकि हरीश त्रिवेदी ने ट्रांसलेट करते हुए ट्रांसलेटर का फ्रीडम लिया है और कई प्रसंगों को अपनी सोच के हिसाब से गैर जरुरी समझ कर हटाया है और कुछ जगह स्वतंत्र टिपण्णी की है.

 

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